समुद्रगुप्त गुप्त राजवंश

समुद्रगुप्त गुप्त राजवंश

समुद्रगुप्त (राज 335-380) गुप्त राजवंश के चौथे राजा और चन्द्रगुप्त प्रथम के उत्तरधिकरी थे। वे भारतीय इतिहास में सबसे बड़े और सफल सेनानायक में से एक माने जाते है। समुद्रगुप्त, गुप्त राजवंश के तीसरे शासक थे, और उनका शासनकाल भारत के लिये स्वर्णयुग की शुरूआत कही जाती है। समुद्रगुप्त को गुप्त राजवंश का महानतम राजा माना जाता है। वे एक उदार शासक, वीर योद्धा और कला के संरक्षक थे। उनका नाम जावा पाठ में तनत्रीकमन्दका के नाम से प्रकट है। उसका नाम समुद्र की चर्चा करते हुए अपने विजय अभियान द्वारा अधिग्रहीत एक शीर्षक होना करने के लिए लिया जाता है जिसका अर्थ है “महासागर”। समुद्रगुप्त के कई अग्रज भाई थे, फिर भी उनके पिता ने समुद्रगुप्त की प्रतिभा के देख कर उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

चंद्रगुप्त ने मगध राजा की एक लच्छवी राजकुमारी कुमारीदेवी से विवाह किया, जिससे उत्तर भारतीय वाणिज्य के मुख्य स्रोत गंगा नदी पर कब्ज़ा करने के लिए उन्हें सक्षम बनाया। उन्होंने भारत के उत्तर-मध्य में लगभग दस वर्षों तक शासन किया।

उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र, समुद्रगुप्त ने राज्य पर शासन करना शुरू किया और जब तक पूरे भारत को जीत नहीं लिया तब तक उन्होंने आराम नहीं किया । उनके शासनकाल को एक विशाल सैन्य अभियान के रूप में वर्णित किया जाता है। शुरूआत में उन्होंने शिच्छत्र (रोहिलखंड) और पद्मावती (मध्य भारत ) के पड़ोसी राज्यों पर हमला किया। उन्होंने विभाजन के बाद पूरे पश्चिम बंगाल पर कब्जा कर लिया, नेपाल के कुछ राज्यों और असम में उनका स्वागत किया गया। उन्होंने कुछ  आदिवासी राज्यों जैसे मलवास, यौधेयस, अर्जुनायन्स, अभ्रस और मदुरस को जीत लिया। बाद में कुशना और सैक ने उनका स्वागत किया।

दक्षिण की ओर, बंगाल की खाड़ी के किनारे उन्होंने महान शक्ति के साथ आगे बढ़कर पीठापुरम के महेंद्रगिरि, कांची के विष्णुगुप्त, कुरला के मंत्रराज, खोसला के महेंद्र से और अधिक आगे गये, जब तक वह कृष्णा नदी तक नहीं पहुँचे।

समुद्रगुप्त ने अपने राज्य को पश्चिम में खानदेश और पलाघाट तक फैलाया। हालांकि उन्होंने मध्य भारत में वातकाटा के साथ मैत्रीपूर्ण रिश्ता बनाए रखने का आश्वासन दिया। उन्होंने बड़ा युद्ध जीतने के बाद हर वार आश्वस्त यज्ञ (घोड़े का बलिदान) का आयोजन किया।

समुद्रगुप्त का राज्य उत्तर में हिमालय तक, दक्षिण में नर्मदा नदी तक, पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक और पश्चिम में यमुना नदी तक फैला हुआ हैं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि को भारत या आर्यावर्त के अधिकतर राजनीतिक एकीकरण में एक भयंकर शक्ति के रूप में वर्णित किया जाता है। उन्हें महाराजाधिराज (राजाओं का राजा) की उपाधि से सम्मानित किया गया।

गुण और चरित्र

सम्राट समुद्रगुप्त के वैयक्तिक गुणों और चरित्र के सम्बन्ध में प्रयाग की प्रशस्ति में बड़े सुन्दर संदर्भ पाये जाते हैं। इसे महादण्ड नायक ध्रुवभूति के पुत्र, संधिविग्रहिक महादण्डनायक हरिषेण ने तैयार किया था। हरिषेण के शब्दों में समुद्रगुप्त का चरित्र इस प्रकार का था – ‘उसका मन विद्वानों के सत्संग-सुख का व्यसनी था। उसके जीवन में सरस्वती और लक्ष्मी का अविरोध था। वह वैदिक मार्ग का अनुयायी था। उसका काव्य ऐसा था, कि कवियों की बुद्धि विभव का भी उससे विकास होता था, यही कारण है कि उसे ‘कविराज’ की उपाधि दी गई थी। ऐसा कौन सा ऐसा गुण है, जो उसमें नहीं था। सैकड़ों देशों में विजय प्राप्त करने की उसमें अपूर्व क्षमता थी। अपनी भुजाओं का पराक्रम ही उसका सबसे उत्तम साथी था। परशु, बाण, शंकु, शक्ति आदि अस्त्रों-शस्त्रों के सैकड़ों घावों से उसका शरीर सुशोभित था।

सिक्का

ज्यादा उसे और शिलालेख द्वारा जारी किए गए सिक्कों के माध्यम से समुद्रगुप्त के बारे में जाना जाता है। इन आठ विभिन्न प्रकार के थे और सभी शुद्ध सोने का बना दिया। अपने विजय अभियान उसे सोने और भी कुषाण के साथ अपने परिचित से सिक्का बनाने विशेषज्ञता लाया। निश्चित रूप से, समुद्रगुप्त गुप्ता मौद्रिक प्रणाली का पिता है। उन्होंने कहा कि सिक्कों की विभिन्न प्रकार शुरू कर दिया। वे मानक प्रकार, आर्चर प्रकार, बैटल एक्स प्रकार, प्रकार, टाइगर कातिलों का प्रकार, राजा और रानी के प्रकार और वीणा प्लेयर प्रकार के रूप में जाना जाता है। वे तकनीकी और मूर्तिकला चालाकी के लिए एक अच्छी गुणवत्ता का प्रदर्शन के सिक्कों की कम से कम तीन प्रकार -। आर्चर प्रकार, लड़ाई-कुल्हाड़ी और टाइगर प्रकार – मार्शल कवच में समुद्रगुप्त का प्रतिनिधित्व करते हैं। जैसे विशेषणों वीरता,घातक लड़ाई-कुल्हाड़ी,बाघ असर सिक्के, उसकी एक कुशल योद्धा जा रहा है साबित होते हैं। सिक्कों की समुद्रगुप्त के प्रकार वह प्रदर्शन किया बलिदान और उसके कई जीत और दर्शाता है।

सिंहल से सम्बन्ध

समुद्रगुप्त के इतिहास की कुछ अन्य बातें भी उल्लेख योग्य हैं। इस काल में सीलोन (सिंहल) का राजा मेघवर्ण था। उसके शासन काल में दो बौद्ध-भिक्षु बोधगया की तीर्थयात्रा के लिए आए थे। वहाँ पर उनके रहने के लिए समुचित प्रबन्ध नहीं था। जब वे अपने देश को वापिस गए, तो उन्होंने इस विषय में अपने राजा मेघवर्ण से शिकायत की। मेघवर्ण ने निश्चय किया, कि बोधगया में एक बौद्ध-विहार सिंहली यात्रियों के लिए बनवा दिया जाए। इसकी अनुमति प्राप्त करने के लिए उसने एक दूत-मण्डल समुद्रगुप्त की सेवा में भेजा। समुद्रगुप्त ने बड़ी प्रसन्नता से इस कार्य के लिए अपनी अनुमति दे दी, और राजा मेघवर्ण ने ‘बौधिवृक्ष’ के उत्तर में एक विशाल विहार का निर्माण करा दिया। जिस समय प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्यू-त्सांग बोधगया की यात्रा के लिए आया था, यहाँ एक हज़ार से ऊपर भिक्षु निवास करते थे।

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