वो बेरहम सा दिन आज भी मुझे

वो बेरहम सा दिन आज भी मुझे


वो बेरहम सा दिन आज भी मुझे

वो बेरहम सा दिन आज भी मुझे अच्छी तरह याद है … जब तुमने मुझे ठुकरा कर दूर चली गई थी … मैं सुनकर तुम्हारी बाते राह में हि मायुश होकर बैठ गया था … ऐसा लगने वाला था मानो मेरे आखोँ का बांध टूटने वाला है ..तुम बेरहम दिल कितनी आसानी से मेरे प्यार को भुलाकर चली गई … मैं मायुश चुपचाप अपने दिल को फुसला रहा था … की तभी अचानक उसकी एक सहेली मेरे पास आकार कहती है ‘’मन’’ वो भी तुमसे बहुत प्यार करती है , पर उसके घर वाले पहले हि उसकी शादी कही और तय कर दिए है , इसलिए वह तुम्हारे प्यार को इंकार कर रही थी … वह अपने परिवार का दिल नहीं दुखाना चाहती है … मगर यह बात सच है कि वो भी तुमसे बहुत प्यार करती है … और उसने यह भी बात कही कि ‘’मन’’ बहुत अच्छा लड़का है , मैं उसे प्यार के साए में रख कर बाद में उसे धोखा नहीं देना चाहती इसलिए इसलिए उसके प्यार को इंकार किया , मुझे माफ कर देना ‘’मन’’ …

                   मैं उसकी सहेली कि बात सुनकर भावुक हो गया, और खुशी से झूम उठा … मगर मेरे दिल में उदासी कि बीज पनप रही थी … खुसी इस बात कि थी कि वो भी मुझसे मोहब्बत करती , और दुःख इस बात कि थी कि ‘’वो मेरी होकर भी मेरी नहीं हो सकती’’ … मेरे दिल एक बात कांटे कि तरह चुभ रही थी, जब हम एक दूसरे से मोहब्बत करते है तब हमारे मुकददर में एक दूसरे से मिलना क्यों नहीं लिखा है …  

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