पेशवा बाजीराव Peshawa Bajirao

पेशवा बाजीराव Peshawa Bajirao

पेशवा बाजीराव Peshawa Bajirao

बाजीराव का जन्म ब्राह्मण परिवार में बालाजी विश्वनाथ के पुत्र के रूप में कोकणस्थ प्रान्त में हुआ था, जो छत्रपति शाहू के प्रथम पेशवा थे। २० वर्ष की आयु में उनके पिता की मृत्यु के पश्यात शाहू ने दुसरे अनुभवी और पुराने दावेदारों को छोड़कर बाजीराव को पेशवा के रूप में नियुक्त किया।

इस नियुक्ति से ये स्पष्ट हो गया था की शाहू को बाजीराव के बालपन में ही उनकी बुद्धिमत्ता का आभास हो गया था। इसलिए उन्होंने पेशवा पद के लिए बाजीराव की नियुक्ति की। बाजीराव सभी सिपाहीयो के बिच लोकप्रिय थे और आज भी उनका नाम आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है।

बाजीराव, वह थे जिन्होंने 41 या उस से भी ज्यादा लड़ाईयां लड़ी थी, और एक भी ना हारने की वजह से विख्यात थे। जनरल मोंटगोमेरी, ब्रिटिश जनरल और बाद में फील्ड मार्शल ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लिखीत रूप में यह स्वीकार भी किया था।

अपने पिता के ही मार्ग पर चलकर, मुघल सम्राटो को समझकर उनकी कमजोरियों को खोजकर उन्हें तोड़ने वाले बाजीराव पहले व्यक्ति थे। सैयद बन्धुओ की शाही दरबार में घुसपैठी या दखल-अंदाजी बंद करवाना भी उनके आक्रमण का एक प्रभावी निर्णय था।

बाद में ग्वालियर के रानोजी शिंदे का साम्राज्य, इंदोर के होल्कर(मल्हारराव), बारोदा के गायकवाड (पिलाजी), और धार के पवार (उदाज्जी) इन सभी का निर्माण बाजीराव द्वारा मराठा साम्राज्य के खंड के रूप में किया गया, क्यूकी वे मुघल साम्राज्य से प्रतीशोध लेकर उनका विनाश कर के उनकी “जागीरदारी” बनाना चाहते थे

जब महाराज शाहू ने १७२० में बालाजी विश्वनाथ के मृत्यूपरांत उसके १९ वर्षीय ज्येष्ठपुत्र बाजीराव को पेशवा नियुक्त किया तो पेशवा पद वंशपरंपरागत बन गया। अल्पव्यस्क होते हुए भी बाजीराव ने असाधारण योग्यता प्रदर्शित की। पेशवा बनने के बाद अगले बीस वर्षों तक बाजीराव मराठा साम्राज्य को बढ़ाते रहे। उनका व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था; तथा उनमें जन्मजात नेतृत्वशक्ति थी। अपने अद्भुत रणकौशल, अदम्य साहस और अपूर्व संलग्नता से, तथा प्रतिभासंपन्न अनुज श्रीमान चिमाजी साहिब अप्पा के सहयोग द्वारा शीघ्र ही उसने मराठा साम्राज्य को भारत में सर्वशक्तिमान् बना दिया। इसके लिए उन्हें अपने दुश्मनों से लगातार लड़ाईयाँ करना पड़ी। अपनी वीरता, अपनी नेतृत्व क्षमता व कौशल युद्ध योजना द्वारा यह महान वीर हर लड़ाई को जीतता गया। विश्व इतिहास में महान श्रीमंतबाजीराव पेशवा एकमात्र ऐसे योद्धा है जो कभी नहीं हारें । छत्रपति शिवाजी महाराज की तरह वह बहुत ही कुशल घुड़सवार थे । घोड़े पर बैठे-बैठे भाला चलाना, बनेठी घुमाना, बंदूक चलाना उनके बाएँ हाथ का खेल था। घोड़े पर बैठकर श्रीमंतबाजीराव के भाले की फेंक इतनी जबरदस्त होती थी कि सामने वाला घुड़सवार अपने घोड़े सहित घायल हो जाता था।

इस समय भारत की जनता मुगलों के साथ-साथ अंग्रेजों व पुर्तगालियों के अत्याचारों से त्रस्त हो चुकी थी। ये भारत के देवस्थान तोड़ते, जबरन धर्म परिवर्तन करते, महिलाओं व बच्चों को मारते व भयंकर शोषण करते थे। ऐसे में श्रीमंतबाजीराव पेशवा ने उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक ऐसी विजय पताका फहराई कि चारों ओर उनके नाम का डंका बजने लगा। लोग उन्हें शिवाजी का अवतार मानने लगे। श्रीमंतबाजीराव पेशवा में शिवाजी महाराज जैसी ही वीरता व पराक्रम था तो वैसा ही उच्च चरित्र भी था।

पेशवा के पद में बाजीराव का कार्य

बाजीराव के पेशवा पद पर आते ही छत्रपति शाहू नाम मात्र के ही शासक बन गए और खासकर सतारा स्थित उनके आवास तक ही सीमित रहगए। मराठा साम्राज्य कुंके नाम पर तो चल रहा था पर असली ताकत पेशवा बाजीराव के हाँथ में था।

बाजीराव के पद पर आने के बाद मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह ने मराठों को शिवाजी की मृत्य के बाद प्रदेशों के अधीनता को याद दिलाया। सन1719 में मुग़लों ने यह भी याद दिलाया की डेक्कन के 6 प्रान्तों से कर वसूलने का मराठों का अधिकार क्या है।

बाजीराव पेशव को इस बात का विश्वास था की मुग़ल सम्राट का पतन होते जा रहा है इसलिए वो उत्तर भारत में अपने चालाकी से अपनेसाम्राज्य का विस्तार करना चाहते हैं। यह सोच कर पेशवा ने हड़ताल शुरू कर दिया।

बुंदेलखंड का अभियान

बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल ने मुग़लों के खिलाफ विद्रोह छेद दिया था। जिसके कारण दिसम्बर 1728 में मुग़लों ने मुहम्मद खान बंगश केनेतृत्व में बुंदेलखंड पर आक्रमण कर दिया और महाराजा के परिवार के लोगों को बंधक बना दिया।

छत्रसाल राजा के बार-बार बाजीराव से मदद माँगने पर मार्च, सन 1729 को को पेशवा बाजीराव ने उत्तर दिया और अपनी ताकत से महाराजाछत्रसाल को उनका सम्मान वापस दिलाया। महाराजा छत्रसाल ने बाजीराव को बहुत बड़ा जागीर सौंपा और अपनी बेटी मस्तानी और बाजीराव काविवाह भी करवाया।

साथ ही महाराजा छत्रसाल ने अपनी मृत्यु सन 1731 के पहले अपने कुछ मुख्य राज्य भी मरातो को सौंप दिया था।

आंशिक सफलताएँ

बालाजी बाजीराव ने हल्के हथियारों से सुसज्जित फुर्तीली पैदल सेना का प्रयोग करने की पुरानी मराठा रणनीति में भी परिवर्तन कर दिया। वहपहले की अपेक्षा अधिक वज़नदार हथियारों से लैस घुड़सवारों और भारी तोपख़ाने को अधिक महत्त्व देने लगा। पेशवा स्वयं अपने सरदारों को पड़ोस केराजपूत राजाओं के इलाक़ों में लूट-ख़सोट करने के लिए उत्साहित करता था। इस प्रकार वह अपने पुराने मित्रों की सहायता से वंचित हो गया, जो उसकेपिता बाजीराव प्रथम के लिए बड़े उपयोगी सिद्ध हुए थे। इसके साथ ही दो मोर्चों पर दक्षिण में ‘निज़ाम’ के विरुद्ध और उत्तर में अहमदशाह अब्दाली केविरुद्ध लड़ने की ग़लती उसने की। आरम्भ में तो उसे कुछ सफलता मिली, उसने निज़ाम को 1750 ई. में उदगिर की लड़ाई में हरा दिया और बीजापुर कापूरा प्रदेश और औरंगाबाद और बीदर के बड़े भागों को निज़ाम से छीन लिया। मराठा शक्ति का सुदूर दक्षिण में भी प्रसार हुआ। उन्होंने मैसूर के हिन्दूराजा को हरा कर बेदनूर पर आक्रमण कर दिया। किन्तु उनके बढ़ाव को मैसूर राज्य के सेनापति हैदर अली ने रोक दिया, जिसने बाद में वहाँ के हिन्दूराजा को अपदस्थ कर दिया।

उत्तर में बालाजी बाजीराव को पहले तो अच्छी सफलता मिली, उसकी सेना ने राजपूतों की रियासतों की मनमाने ढंग से लूटपाट की, दोआब को रौंदकरउस पर अधिकार कर लिया, मुग़ल बादशाह से गठबंधन करके दिल्ली पर दबदबा जमा लिया, अब्दाली के नायब नाजीबुद्दौला को खदेड़ दिया और पंजाबसे अब्दाली के पुत्र तैमूर को निष्कासित कर दिया। इस प्रकार मराठों का दबदबा अटक तक फैल गया। किन्तु मराठों की यह सफलता अल्पकालिक सिद्धहुई।

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