By | March 17, 2019
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Maharaja Ranjit Singh ; एक मुसलमान खुशनवीस ने अनेक वर्षो की साधना और श्रम से कुरान शरीफ की एक अत्यंत सुन्दर प्रति सोने और चाँदी से बनी स्याही से तैयार की. उस प्रति को लेकर वह पंजाब और सिंध के अनेक नवाबो के पास गया. सभी ने उसके कार्य और कला की प्रशंसा की परन्तु कोई भी उस प्रति को खरीदने के लिए तैयार न हुआ. खुशनवीस उस प्रति का जो भी मूल्य मांगता था, वह सभी को अपनी सामर्थ्य से अधिक लगता था.

        निराश होकर खुशनवीस लाहौर आया और महाराजा रणजीत सिंह के सेनापति से मिला. सेनापति ने उसके कार्य की बड़ी प्रशंसा की परन्तु इतना अधिक मूल्य देने में उसने खुद को असमर्थ पाया. महाराजा रणजीत सिंह ने भी यह बात सुनी और उस खुशनवीस को अपने पास बुलवाया. खुशनवीस ने कुरान शरीफ की वह प्रति महाराज को दिखाई.

        महाराजा रणजीत सिंह ने बड़े सम्मान से उसे उठाकर अपने मस्तक में लगाया और वजीर को आज्ञा दी- ” खुशनवीस को उतना धन दे दिया जाय, जितना वह चाहता है और कुरान शरीफ की इस प्रति को मेरे संग्रहालय में रख दिया जाय ”.

महाराज के इस कार्य से सभी को आश्चर्य हुआ. फ़क़ीर अजिजद्दीन ने पूछा- हुजूर, आपने इस प्रति के लिए बहुत बड़ी धनराशि दी है, परन्तु वह तो आपके किसी काम की नहीं है क्योंकि आप सिख है और यह मुसलमानों की धर्मपुस्तक है.

महाराज ने उत्तर दिया- फ़क़ीर साहब, ईश्वर की यह इच्छा है की मैं सभी धर्मो को एक नजर से देखूँ.

        सुकरचकिया इस मिसल राज्यों के प्रमुख महा सिंह का महाराज रणजीत सिंह ये बेटा है। इ.स. 1798 में लाहोर का राज्यपाल पद और राजा का किताब मिलने के बाद उनके कर्तुत्व सच्चा मान मिला। उन्होंने खुद के दम अमृतसर शहर जीता और सतलज नदी तक का प्रदेश काबु में किया।

        रणजीतसिंह ने अंग्रेजो की शक्ति को समय राहाते ही पहचान लिया था। उन्हें हराने के लिये रणजीतसिंह ने अच्छे दर्जे की सैन्य तयार किये। खुद की तोफों की फॅक्ट्री निकाली। उनके सैनिकों में सिख, मुस्लिम, गुरखे, पठान, बिहारी, डोगरा ये शामील थे। आशिया के कुछ ही लेकीन उत्तम सैनिकों में उनके सैनिकों का समावेश होता था।

        रणजीतसिंह का राज्यप्रशासन बहोत अच्छा था। सिर्फ सिखों काही कल्याण ऐसा उनका लक्ष कभी भी नहीं था। कर में से 50 प्रतिशत उत्पादन का हिस्सा जमा करके राज्य का खर्चा किया जाता था।

        1809 को ब्रिटिशो से हुये अमृतसर तह के अनुसार सतलज के पश्चिम के तरफ का क्षेत्र रणजीतसिंह के राज के निचे आया। अफगान राजा शाह्शुजा इसे उन्होंने किये हुये मदत के बदले में दुनिया का प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा फिर से भारत में आया। अंग्रेजो से उन्होंने व्यापारी करार किया था। रणजीतसिंह जब तक है तब तक ये प्रदेश उनके काबु में नहीं आयेंगा ये सच्चाई अंग्रेजोने पहचान ली थी।

        1839 को रणजीतसिंह की मौत होने के बाद उनके सरदारों में सत्ता के लिये मुकाबला हुवा। अंग्रेजोने इसका फायदा उठाया और पंजाब के सिंह का राज्य खतम हुवा।

धार्मिक सद्भाव

पंजाब के लोक जीवन और लोक कथाओं में महाराजा रणजीत सिंह से सम्बन्धित अनेक कथाएं कही व सुनी जाती हैं। इसमें से अधिकांश कहानियाँ उनकी उदारता, न्यायप्रियता और सभी धर्मों के प्रति सम्मान को लेकर प्रचलित हैं। उन्हें अपने जीवन में प्रजा का भरपूर प्यार मिला। अपने जीवन काल में ही वे अनेक लोक गाथाओं और जनश्रुतियों का केंद्र बन गये थे।

एक मुसलमान खुशनवीस ने अनेक वर्षों की साधना और श्रम से ‘क़ुरान शरीफ़’ की एक अत्यंत सुन्दर प्रति सोने और चाँदी से बनी स्याही से तैयार की। उस प्रति को लेकर वह पंजाब और सिंध के अनेक नवाबों के पास गया। सभी ने उसके कार्य और कला की प्रशंसा की, परन्तु कोई भी उस प्रति को खरीदने के लिए तैयार न हुआ। खुशनवीस उस प्रति का जो भी मूल्य मांगता था, वह सभी को अपनी सामर्थ्य से अधिक लगता था। निराश होकर खुशनवीस लाहौर आया और महाराजा रणजीत सिंह के सेनापति से मिला। सेनापति ने उसके कार्य की बड़ी प्रशंसा की, परन्तु इतना अधिक मूल्य देने में उसने खुद को असमर्थ पाया। महाराजा रणजीत सिंह ने भी यह बात सुनी और उस खुशनवीस को अपने पास बुलवाया। खुशनवीस ने क़ुरान शरीफ़ की वह प्रति महाराज को दिखाई। महाराजा रणजीत सिंह ने बड़े सम्मान से उसे उठाकर अपने मस्तक में लगाया और वज़ीर को आज्ञा दी- “खुशनवीस को उतना धन दे दिया जाय, जितना वह चाहता है और क़ुरान शरीफ़ की इस प्रति को मेरे संग्रहालय में रख दिया जाय।” महाराज के इस कार्य से सभी को आश्चर्य हुआ।

कश्मीर और कोहिनूर

बात सन् 1812 की है। पंजाब पर महाराजा रणजीत सिंह का एकछत्र राज्य था। उस समय महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर के सूबेदारअतामोहम्मद के शिकंजे से कश्मीर को मुक्त कराने का अभियान शुरू किया था। इस अभियान से भयभीत होकर अतामोहम्मद कश्मीर छोड़कर भागगया। कश्मीर अभियान के पीछे एक अन्य कारण भी था। अतामोहम्मद ने महमूद शाह द्वारा पराजित शाहशुजा को शेरगढ़ के किले में कैद कर रखाथा। उसे कैदखाने से मुक्त कराने के लिए उसकी बेगम वफा बेगम ने लाहौर आकर महाराजा रणजीत सिंह से प्रार्थना की और कहा कि मेहरबानी करआप मेरे पति को अतामोहम्मद की कैद से रिहा करवा दें, इस अहसान के बदले बेशकीमती कोहिनूर हीरा आपको भेंट कर दूंगी। शाहशुजा के कैद होजाने के बाद वफा बेगम ही उन दिनों अफगानिस्तान की शासिका थी। इसी कोहिनूर को हड़पने के लालच में भारत पर आक्रमण करने वाले अहमद शाहअब्दाली के पौत्र जमान शाह को स्वयं उसी के भाई महमूद शाह ने कैदखाने में भयंकर यातनाएं देकर उसकी आंखें निकलवा ली थीं।

        जमान शाह अहमद शाह अब्दाली के बेटे तैमूर शाह का बेटा था, जिसका भाई था महमूद शाह। अस्तु, महाराजा रणजीति सिंह स्वयं चाहते थेकि वे कश्मीर को अतामोहम्मद से मुक्त करवाएं। अत: सुयोग आने पर महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर को आजाद करा लिया। उनके दीवानमोहकमचंद ने शेरगढ़ के किले को घेर कर वफा बेगम के पति शाहशुजा को रिहा कर वफा बेगम के पास लाहौर पहुंचा दिया।

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