By | March 19, 2019
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Dropdi द्रौपदी महाभारत के सबसे प्रसिद्ध पात्रों में से एक है। इस महाकाव्य के अनुसार द्रौपदी पांचाल देश के राजा द्रुपद की पुत्री है जो बाद में पांचों पाण्डवों की पत्नी बनी। द्रौपदी पंच-कन्याओं में से एक हैं जिन्हें चिर-कुमारी कहा जाता है। ये कृष्णा, यज्ञसेनी, महाभारती, सैरंध्री अदि अन्य नामो से भी विख्यात है।द्रौपदी का विवाह पाँचों पाण्डव भाईयों से हुआ था। पांडवों द्वारा इनसे जन्मे पांच पुत्र (क्रमशः प्रतिविंध्य, सुतसोम, श्रुतकीर्ती, शतानीक व श्रुतकर्मा) उप-पांडव नाम से विख्यात थे।

प्राचीन भारत के महाकाव्य महाभारत के अनुसार द्रौपदी का जन्म महाराज द्रुपद के यहाँ यज्ञकुण्ड से हुआ था। द्रौपदी का जन्म महाराज द्रुपद के यहाँ यज्ञकुण्ड से हुआ था। अतः यह ‘यज्ञसेनी’ भी कहलाई। द्रौपदी पूर्वजन्म में किसी ऋषि की कन्या थी। उसने पति पाने की कामना से तपस्या की। शंकर ने प्रसन्न होकर उसे वर देने की इच्छा की। उसने शंकर से पांच बार कहा कि वह सर्वगुणसंपन्न पति चाहती है। शंकर ने कहा कि अगले जन्म में उसके पांच भरतवंशी पति होंगे, क्योंकि उसने पति पाने की कामना पांच बार दोहरायी थी।

जब पाण्डव तथा कौरव राजकुमारों की शिक्षा पूर्ण हो गई तो उन्होंने द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा देना चाहा। द्रोणाचार्य को द्रुपद के द्वारा किये गये अपने अपमान का स्मरण हो आया और उन्होंने राजकुमारों से कहा, “राजकुमारों! यदि तुम गुरुदक्षिणा देना ही चाहते हो तो पाञ्चाल नरेश द्रुपद को बन्दी बना कर मेरे समक्ष प्रस्तुत करो। यही तुम लोगों की गुरुदक्षिणा होगी।” गुरुदेव के इस प्रकार कहने पर समस्त राजकुमार अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र ले कर पाञ्चाल देश की ओर चले।

वास्तव में द्रौपदी साक्षात शची थी और पांडव इन्द्र के ही पांच रूप थे। पूर्वकाल में इन्द्र के हाथों त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप का हनन हो गया था। ब्रह्महत्या के कारण इन्द्र का तेज़ धर्मराज में प्रविष्ट हो गया। त्वष्टा ने क्रुद्ध होकर अपनी एक जटा उखाड़कर होम की। फलत: होमकुण्ड से वृत्र का आविर्भाव हुआ। उसे अपने वध के लिए उद्यत देख इन्द्र ने सप्तर्षियों से प्रार्थना की। उन्होंने कुछ शर्तों पर उन दोनों का समझौता करवा दिया। इन्द्र ने शर्त का उल्लंघन कर वृत्र को मार डाला, अत: इन्द्र के शरीर से निकलकर ‘बल’ ने वायु में प्रवेश किया। इन्द्र ने गोतम का रूप धारण कर अहिल्या के सतीत्व का नाश किया, अत: उसका रूप उसे छोड़ अश्विनीकुमारों में समा गया। पृथ्वी का भार हल्का करने के लिए जब सब देवता पृथ्वी पर अवतार लेने लगे, तब धर्म ने इन्द्र का तेज़ कुंती के गर्भ में प्रतिष्ठित किया, अत: युधिष्ठिर का जन्म हुआ। इसी प्रकार वायु ने इन्द्र का बल कुंती के गर्भ में प्रतिष्ठत किया तो भीम का जन्म हुआ। इन्द्र के आधे अंश से अर्जुन तथा अश्विनीकुमारों के द्वारा माद्री के गर्भ में इन्द्र के ही ‘रूप’ की प्रतिष्ठा के फलस्वरूप नकुल और सहदेव का जन्म हुआ। इस प्रकार पांडव इन्द्र के रूप थे तथा कृष्णा शची का ही दूसरा रूप थी

द्रौपदी का विवाह

“मैं महाराज द्रुपद की नगरी पाञ्चाल से आ रहा हूँ। वहाँ पर द्रुपद की कन्या द्रौपदी के स्वयंवर के लिये अनेक देशों के राजा-महाराजा पधारे हुये हैं।”

वेदव्यास-तुम लोग पाञ्चाल चले जाओ। वहाँ द्रुपद कन्या पाञ्चाली का स्वयंवर होने जा रहा है। वह कन्या तुम लोगों के सर्वथा योग्य है शिव जी ने उसे अगले जन्म में पाँच उत्तम पति प्राप्त होने का वरदान दिया था। वह देविस्वरूपा बालिका सब भाँति से तुम लोगों के योग्य ही है। तुम लोग वहाँ जा कर उसे प्राप्त करो।

स्वयंवर सभा में अनेक देशों के राजा-महाराजा एवं राजकुमार पधारे हुये थे कुछ ही देर में राजकुमारी द्रौपदी हाथ में वरमाला लिये अपने भाई धृष्टद्युम्न के साथ उस सभा में पहुँचीं। धृष्टद्युम्न ने सभा को सम्बोधित करते हुये कहा, “विभिन्न देश से पधारे राजा-महाराजाओं एवं अन्य गणमान्य जनो से मेरी बहन द्रौपदी का विवाह होगा।”

एक के बाद एक सभी राजा-महाराजा एवं राजकुमारों ने एक ऊपर घूमती हुई मछली की आंख प्र उसके प्रतिबिम्ब को नीचे जल में देखकर निशाना साधने का प्रयास किया किन्तु सफलता हाथ न लगी और वे कान्तिहीन होकर अपने स्थान में लौट आये। इन असफल लोगों में जरासंध, शल्य, शिशुपाल तथा दुर्योधन, दुःशासन आदि कौरव भी सम्मिलित थे। कौरवों के असफल होने पर एक ब्राह्मण को राजकुमारी को प्राप्त करना चाहा। अर्जुन ने तैलपात्र में प्रतिबिम्ब को देखते हुये एक ही बाण से निशाना लगा डाला। द्रौपदी ने आगे बढ़ कर अर्जुन के गले में वरमाला डाल दिया।

एक ब्राह्मण के गले में द्रौपदी को वरमाला डालते देख समस्त क्षत्रिय राजा-महाराजा एवं राजकुमारों ने क्रोधित हो कर अर्जुन पर आक्रमण कर दिया। पाण्डवों तथा क्षत्रिय राजाओं में घमासान युद्ध होने लगा।

कृष्ण द्वारा सहायता

एक दिन की बात है, जब पांडव द्रौपदी के साथ काम्यभक वन में निवास कर रहे थे, दुर्योधन के भेजे हुए महर्षि दुर्वासा अपने दस हज़ार शिष्योंको साथ लेकर पांडवों के पास आये। दुष्ट दुर्योधन ने जान-बूझकर उन्हें ऐसे समय भेजा, जबकि सब लोग भोजन करके विश्राम कर रहे थे। महाराजयुधिष्ठिर ने अतिथि सेवा के उद्देश्य से ही भगवान सूर्यदेव से एक ऐसा चमत्कारी बर्तन प्राप्त किया था, जिसमें पकाया हुआ थोड़ा-सा भी भोजन अक्षयहो जाता था, परंतु उसमें शर्त यह थी कि जब तक द्रौपदी भोजन नहीं कर चुकती थी, तभी तक उस बर्तन में यह चमत्कार रहता था। युधिष्ठिर ने महर्षिको शिष्यमण्डली के सहित भोजन के लिये आमन्त्रित किया और दुर्वासा जी स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होने के लिये सबके साथ गंगातट पर चलेगये।

दुर्वासा जी के साथ दस हज़ार शिष्यों का एक पूरा-का-पूरा विश्वविद्यालय चला करता था। धर्मराज ने उन सबको भोजन का निमन्त्रण तो देदिया और ऋषि ने उसे स्वीकार भी कर लिया, परन्तु किसी ने भी इसका विचार नहीं किया कि द्रौपदी भोजन कर चुकी है, इसलिये सूर्य के दिये हुए बर्तनसे तो उन लोगों के भोजन की व्यवस्था हो नहीं सकती थी। द्रौपदी बड़ी चिन्ता में पड़ गयी। उसने सोचा- “ऋषि यदि बिना भोजन किये वापस लौट जातेहैं तो वे बिना शाप दिये नहीं मानेंगे।” उनका क्रोधी स्वभाव जगदविख्यात था।

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