By | January 21, 2020
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खुद को खास समझ बैठा था

Fursat Hindustan Newspaper poem

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शायद गलती मेरी ही थी ,

मै खुद को खास समझ बैठा था ।

तुम्हे खुद के पास समझ बैठा था ।

तुम खुश थी पहले से ही ,

पर मैं तुम्हें उदास समझ बैठा था ।

हाँ , उम्मीदें चोट पहुंचाती हैं ऐसा मैंनें सुना था ,,

पर सुनकर भी मैंनें किया अनसुना था ।

शायद पहले ही समझ जाता तो अच्छा होता ,

न आज मेरा वक्त मुझसे ही इस तरह खफा होता ।

पहले हँसा मैं भी करता था ,

अब बस मुस्कुरा दिया ही करता हूँ ।

गम बहुत है मेरे अंदर ,

लेकिन सब छिपा दिया करता हूँ ।

मैंने खुद की हँसी गवा कर ,

तुम्हे हँसाने की कोशिश की थी ।

अपना वजूद मिटा कर ,

बस तुम्हें पाने की कोशिश की थी ।

आज तुम्हारे पास मेरे लिए दो पल नहीं है ,

मेरे पास इस समस्या का आज तक कोई हल नहीं है ।

अब मैं क्या लिखूँ , ज्यादा लिखूँ तो आँसू बह आते हैं ,,

दिल की बात तुमसे हम कहाँ कह पाते हैं ।

रितिक रंजन , सासाराम , बिहार

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