By | March 5, 2019
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      राहुल गांधी Rahul Gandhi का जन्म 19 जून 1970 को दिल्ली में हुआ. वे प्राचीन भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी के दो बच्चों में सबसे बड़े थे. उनकी माता सोनिया गांधी वैसे तो इटली से है लेकिन अभी उन्होंने भारत की नागरिकता स्वीकार कर ली है. उनकी छोटी बहन प्रियंका वाड्रा ने व्यापारी रोबर्ट वाड्रा से शादी कर ली. राहुल गांधी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा सेंट कोलंबिया स्कूल दिल्ली से ग्रहण की और फिर बाद में 1981 से 1983 तक वे पढ़ने के लिए डून स्कूल, देहरादून, उत्तराखंड गए.

        अब तक उनके जीवन में उनके साथ काफी हादसे हुए. 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गयी, जिसने राजीव गांधी को राजनीती में लाया और परिणामतः उन्हें भी भारत के प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त किया गया. गांधी परिवार का उस समय सिख समुदाय में काफी विरोध किया था इसके चलते उस दौरान उनके परिवार को बहोत सुरक्षा प्रदान की गयी थी. परिणामतः विरोध के चलते राहुल और उनकी बहन प्रियंका को घर पर ही शिक्षा दी जाती थी. 

        राहुल गांधी की प्रांरभिक शिक्षा दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल से हुई और इसके बाद की शिक्षा प्रसिद्द स्कूल दून विश्वविद्यालय से पूरी क़ी। १९८१ से १९८३ तक कुछ सिख चरमपंथियों के खतरे से सुरक्षा कारणों से राहुल और उनकी छोटी बहन प्रियंका गांधी को अपनी पढाई घर से ही करनी पड़ी । राहुल ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रोलिंस कॉलेज फ्लोरिडा से सन 1994 में अपनी कला स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद सन 1995 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से एमफिल की डिग्री हासिल की। अपनी स्नातक की शिक्षा पूरी करने के बाद राहुल ने लंदन में मॉनिटर गुरुप के साथ प्रबंधन परामर्श के रूप में ३ साल तक काम किया। इस कंपनी में  कार्यकाल के दौरान उनके सहकर्मी इस बात से अनजान थे की वो किसके साथ काम कर रहे है क्योंकि राहुल यहाँ छोटा नाम रॉल विंसी के नाम में कार्य करते थे। 


        2003 में, राहुल गांधी के राष्ट्रीय राजनीति में आने के बारे में बड़े पैमाने पर मीडिया में अटकलबाजी का बाज़ार गर्म था, जिसकी उन्होंने तब कोई पुष्टि नहीं की। वह सार्वजनिक समारोहों और कांग्रेस की बैठकों में बस अपनी माँ के साथ दिखाई दिए। एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट श्रृंखला देखने के लिए सद्भावना यात्रा पर अपनी बहन प्रियंका गाँधी के साथ पाकिस्तान भी गए।

        जनवरी 2004 में राजनीति उनके और उनकी बहन के संभावित प्रवेश के बारे में अटकलें बढ़ीं जब उन्होंने अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र अमेठी का दौरा किया, जहाँ से उस समय उनकी माँ सांसद थीं। उन्होंने यह कह कर कि “मैं राजनीति के विरुद्ध नहीं हूँ। मैंने यह तय नहीं किया है कि मैं राजनीति में कब प्रवेश करूँगा और वास्तव में, करूँगा भी या नहीं।” एक स्पष्ट प्रतिक्रिया देने से मना कर दिया था

        वर्ष २००३  में राहुल गांधी ने भारतीय राजनीति में रुचि लेना प्रारंभ किया। वे सार्वजनिक समारोहों में अपनी मां श्रीमती सोनिया गांधी के साथ दिखाई देने लगे। मार्च २००४ में चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ उन्होंने राजनीति में अपने प्रवेश की घोषणा की।

        वर्ष 2003 में राहुल गांधी ने राष्ट्रीय राजनीति में रुचि लेना प्रारंभ किया। वे सार्वजनिक समारोहों में अपनी मां श्रीमती सोनिया गांधी के साथ दिखाई देने लगे।   

        मार्च 2004 में चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ उन्होंने राजनीति में अपने प्रवेश की घोषणा की, जिसमें वे अपने पिता के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी से लोकसभा के लिए खड़े हुए और लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए।  

        2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए एक उच्च स्तर के कांग्रेस अभियान में उन्हें प्रमुख व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया। हालांकि पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इससे राहुल को काफी आलोचना भी झेलना पड़ी थी।  

        राहुल को 24 सितंबर 2007 में पार्टी सचिवालय के एक फेरबदल में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का महासचिव नियुक्त किया गया।    उसी फेरबदल में, उन्हें युवा कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। उनकी छवि कांग्रेस में एक युवा नेता के रूप में उभरी।  

        वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 333000 वोटों के बड़े अंतर से पराजित किया।  इन चुनावों में कांग्रेस ने 80 लोकसभा क्षेत्रों वाले राज्य में 21 सीटें जीतकर राज्य में पार्टी में नए उत्साह का संचार किया। उस समय इस बदलाव का श्रेय भी राहुल गांधी को दिया गया।
 
शुरूआती कैरियर


        स्नातक स्तर तक की पढ़ाई कर चुकने के बाद राहुल ने प्रबंधन गुरु माइकल पोर्टर की प्रबंधन परामर्श कंपनी मॉनीटर ग्रुप के साथ 3 साल तक काम किया। इस दौरान उनकी कंपनी और सहकर्मी इस बात से पूरी तरह से अनभिज्ञ थे कि वे किसके साथ काम कर रहे हैं क्योंकि राहुल यहां एक छद्म नाम रॉल विंसी के नाम से इस कम्पनी में नियोजित थे। राहुल के आलोचक उनके इस कदम को उनके भारतीय होने से उपजी उनकी हीन-भावना मानते हैं जब कि, काँग्रेसी उनके इस कदम को उनकी सुरक्षा से जोड़ कर देखते हैं। सन 2002 के अंत में वह मुंबई में स्थित अभियांत्रिकी और प्रौद्योगिकी से संबंधित एक कम्पनी ‘आउटसोर्सिंग कंपनी बैकअप्स सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड’ के निदेशक-मंडल के सदस्य बन गये।

कांग्रेस के नेता

        मई 2004 लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी विशाल बहुमत से जीते। 1,00,000 मतों के बड़े अंतर से उनकी जीत हुई। जब कांग्रेस ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को अप्रत्याशित रूप से हराया। इस अभियान में उनकी छोटी बहन प्रियंका गांधी उनके साथ क़दम से क़दम मिलाकर उनके साथ थीं।[2] सन 2006 तक उन्होंने कोई अन्य पद ग्रहण नहीं किया और निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दों और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया। भारत और अंतरराष्ट्रीय प्रेस में व्यापक रूप से चर्चा थी कि सोनिया गांधी उन्हें राष्ट्रीय स्तर का कांग्रेस नेता बनाने के लिए तैयार कर रही हैं।[3] राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी ने 2006 के चुनाव में रायबरेली से पुनः निर्वाचित होने के लिए अपनी माँ सोनिया गांधी के चुनाव अभियान को सम्भाला और सोनिया गांधी 4,00,000 मतों से विजित हुईं। दिवंगत राजीव गांधी की इस मंशा और उनके सपनों को उनके पुत्र और अमेठी के सांसद राहुल गांधी ने पढा है जिसे वह निरन्तर अमेठी की ज़मीन पर उतारने में अपना क़दम बढाते जा रहे हैं। राहुल गांधी की भी मंशा नई तकनीक और विज्ञान की हर लाभकारी योजना अमेठी के अन्तिम व्यक्ति तक पहुंचाना है। साफ्टवेयर के बादशाह बिल गेट्स का राहुल के साथ दौरा अमेठी में कम्प्यूटर योजना को उतारने का ही संकेत माना जा रहा है।

आलोचना

        जब 2006 के आखिर में न्यूज़वीक ने इल्जाम लगाया की उन्होंने हार्वर्ड और कैंब्रिज में अपनी डिग्री पूरी नहीं की थी या मॉनिटर ग्रुप में काम नहीं किया था, तब राहुल गांधी के कानूनी मामलों की टीम ने जवाब में एक कानूनी नोटिस भेजा, जिसके बाद वे जल्दी से मुकर गए या पहले के बयानों का योग्य किया।

        राहुल गांधी ने 1971 में पाकिस्तान के टूटने को, अपने परिवार की “सफलताओं” में गिना.इस बयान ने भारत में कई राजनीतिक दलों से साथ ही विदेश कार्यालय के प्रवक्ता सहित पाकिस्तान के उल्लेखनीय लोगों से आलोचना को आमंत्रित किया.प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब ने कहा की यह टिप्पणी “..बांग्लादेश आंदोलन का अपमान था।

        2007 में उत्तर प्रदेश के चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने कहा की “यदि कोई गांधी-नेहरू परिवार से राजनीति में सक्रिय होता तो, बाबरी मस्जिद नहीं गिरी होती”.इसे पी वी नरसिंह राव पर हमले के रूप में व्याख्या क्या गया था, जो 1992 में मस्जिद के विध्वंस के दौरान प्रधानमंत्री थे। गांधी के बयान ने भाजपा, समाजवादी पार्टी और वाम के कुछ सदस्यों के साथ विवाद शुरू कर दिया, दोनों “हिन्दू विरोधी” और “मुस्लिम विरोधी” के रूप में उन्हें उपाधि देकर. स्वतंत्रता सेनानियों और नेहरू-गांधी परिवार पर उनकी टिप्पणियों की BJP के नेता वेंकैया नायडू द्वारा आलोचना की गई है, जिन्होंने पुछा की “क्या गांधी परिवार आपातकाल लगाने की जिम्मेदारी लेगा?”

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